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पूंजी नियंत्रण किसे कहते हैं?

लोन या इक्विटी के रूप मे आने वाली विदेशी पूंजी को कुछ शर्तों के साथ नियंत्रित करने को पूंजी नियंत्रण कहा जाता है। बहुत सी बंद अर्थव्यवस्था वाले देशों ने विदेशी पूंजी पर नियंत्रण बना रखी है।  इनमें से बहुत से देशों ने ८० के दशक में विदेशी पंूजी को अपनाया। उस समय पूंजी के प्रवाह के लिए कईं सारी सुविधाएं दी गईं और वैश्विक वित्तीय संस्थानों के साथ घनिष्ठता बढ़ाने के प्रयास किए गए।पूंजी प्रवाह क्या होता है?विदेशी पंूजी के प्रवाह को मुख्यत: दो भागों में बांटा जा सकता है। इनमें से एक होता है करंट अकाउंट और दूसरा कैपिटल अकाउंट। करंट अकाउंट में उत्पाद और सेवाओं को शामिल किया जाता है जो स्थायी होते हैं। कैपिटल अकाउंट में लोन और इक्विटी में किया गया निवेश होता है जो रिजर्व भी हो सकता है। जिससे नीति निर्माता पूंजी के प्रवाह पर निगाह रख सके।

भारत में पूंजी प्रवाह के प्रकारभारत में कई तरह से पूंजी का प्रवाह होता है। इसमें भारतीय कार्पोेरेट्स और व्यावसायियों द्वारा लिया गया विदेशी कर्ज, एनआरआई डिपॉजिट्स, स्टाक मार्केट में संस्थागत निवेश के माध्यम से और सरकार को मिलने वाला कर्ज और कम अवधि के व्यापार कर्ज शामिल हैं। विदेशी संस्थागत निवेशक बड़ी मात्रा में पूंजी निवेश करते हैं। लेकिन इनके स्थायित्व को लेकर खतरा बना रहता है।

भारत में पूंजी विस्फोट को नियंत्रित करने की व्यवस्था।भारत में पूंजी अकाउंट ट्रांजेक्शन और करंट अकाउंट दोनों तरह से पूंजी नियंत्रण की व्यवस्था है। इसे केंद्रीय बैंक द्वारा निर्धारित किया जाता है। हालांकि १९९१ में जब भारतीय अर्थव्यवस्था का स्वरूप बदला तब से रूपये को परिवर्तनीय बनाया गया है।  लेकिन बाद में जब पूंजी प्रवाह बढ़ा तो १९९४ में सरकार ने विदेशी पोर्टफोलियो इन्वेस्टमेंट की स्थापना कर दी। सरकार ने प्रत्यक्ष विदेशी पूंजी निवेश नियमों और विदेशी कर्ज नियमों को आसान बनाया।

नीति निर्माता दोबारा से नियंत्रण क्यों बढ़ाना चाहते हैं। सरकार ने देश में पूंजी की कमी को देखते हुए अर्थव्यवस्था के विकास के लिए विदेशी पूंजी निवेश को छूट दी। लेकिन अब इसे कुछ खतरे भी पैदा हुए हैं जिनमें घरेलू मुद्रा की कीमत और घरेलू स्तर पर बढ़ रही लिक्विडी की समस्या शामिल है। (जैसे केंद्रीय बैंक घरेलू मुद्रा को मजबूती देने के लिए विदेशी मुद्रा की खरीददारी करता है।) विदेशी मुद्रा पर निर्भरता किसी भी देश के लिए खतरे को बढ़ाती है। आर्थिक मंदी के बाद से अनेक उभरती हुई अर्थव्यवस्थाओं में विदेशी पूंजी प्रवाह बढ़ा है जिनमें भारत भी शामिल है। लेकिन पूंजी के इस प्रवाह के कारण इन देशों को कईं समस्याओं का सामना भी करना पड़ा है जिनमें से घरेलू स्तर पर महंगाई बढऩा एक महत्वपूर्ण समस्या है। इस वजह से पूंजी नियंत्रण पर जोर दिया जा रहा है। विदेशी पूंजी पर नियंत्रण के लिए कई देशों ने इन पर टैक्स लगाया जा रहा है। भारत में भी इस तरह के टैक्स की मांग उठने लगी थी। लेकिन अभी इस पर कोई टैक्स नहीं है।

 




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